Monday, July 27, 2009

मिले हैं ग़म कितने ही मुझे जमाने में
भरा है दर्द ही दर्द बेहद मेरे फ़साने में

है जिद कि मेरी सितम तेरे आजमाने की
मजा तुझे जो आता है गर मुझे सताने में

आ कभी बैठ तो फुरसत से मेरे पास में तू
वक्त लगना है जरा ज़ख्म तुझे दिखाने में

है कबूल मुझको दुनिया के इल्जाम सभी
अभी भी बाकी है बहुत जान तेरे दीवाने में

क्यूँ खफा हो के तुम इस तरह सताते हो
तेरा भी कोई दिन गुजरे मुझे मनाने में


Manish Tiwari
वो अपने हुस्न को कैद-ए-नकाब रखते है
साँस में खुशबू तो आँखों में शराब रखते है

कि अदायें उनकी किसी कातिल से कम नही
जुल्फ में बिजली जो होंठो पे गुलाब रखते है

एक औराक-ए-उल्फत भी नही नसीब हमको
सुनते है कि वो पास अपने पूरी किताब रखते है

शाम रंगीन सा हो और पास हो वो माह्पारा
तेरे दीवाने भी कुछ ऐसे हसीं ख्वाब रखते हैं

छू ले गर भूल से तुझको तो पिघल जाये ही
तन में अपने वो क़यामत सा शबाब रखते है

हमने देखा है उसके हुस्न-औ-जमील का असर
अब तो वाइज भी अपनी नीयत ख़राब रखते है

Manish Tiwari

Tuesday, June 16, 2009

बात जो दिल में थी वो लफ्जों में ढलना बाकि है
कि जैसे नींद तो टूटी फकत आँख मलना बाकि है

वफ़ा की राह में चल कर ये अब हमको हासिल है
कि सामने ही है मंजिल बस और चलना बाकि है

कहाँ कि तुझ बिन जिन्दगी हो मेरी बसर कभी
चिता हो जैसे सजी कोई बस और जलना बाकि है

जिन्दगी की भी तो बस अपनी यही कहानी है
हुआ हो दिन तमाम जैसे बस शाम ढलना बाकि है

मिला है मुझको वफ़ा का सिला यूँ दुनिया में
जुबां खामोश सी है बस अश्क निकलना बाकि है


Manish Tiwari

Tuesday, June 2, 2009


मेरे आँख में जो अश्क है वो पानी ही तो है
मेरे दिल का ये हाल महज कहानी ही तो है

जख्म जो तूने दिए मुझको वो मेरे दिल में है
मेरे नज़रों में तेरे प्यार की निशानी ही तो है

प्यार का डोर जो टूटा तो क्यूँ ये समझ ले
वजह इसकी फकत अपनी नादानी ही तो है

अब तलक क्यूँ जिन्दा हूँ बिछड़ के तुझसे
ये मेरे दिल में तेरे प्यार की रवानी ही तो है

धड़कने थम सी गयी सांस अब रुक सी गयी
कशमकश कैसी जब जान ये जानी ही तो है

Manish Tiwari

Sunday, May 24, 2009

मैं तो एक बेघर आवारा निकला
प्यासा पंछी और बंजारा निकला

मैं समझता था मसीहा जिसको
शख्स वो दर्द का मारा निकला

आज गर याद जो आई फिर से
आँख से अश्क ये सारा निकला

नाखुदा ने जहाँ डुबोया मुझको
पास ही उसके किनारा निकला

दिल पे इल्जाम वो लगाते क्यूँ है
दिल मेरा पागल बेचारा निकला

जाने वो क्यूँ मुजतरिब हो बैठे
सामने जिक्र जब हमारा निकला

मुजतरिब = परेशान

Manish Tiwari

Wednesday, May 13, 2009

जब से मिली है तुमसे नज़र हमको मोहब्बत हो गयी है
चैन नही आराम नही बस एक शरारत हो गयी है

रोज यूँ ही मिलते हो मगर, बातें नही होती है कभी
बातें करो और प्यार करो बस एक शिकायत हो गयी है

तुम न मिली जो हमको सनम, दर्द बढेगा इस दिल का
तब हम समझेंगे, हमको सनम हमसे अदावत हो गयी है

भूल गए है क्या है खुदा, और भूल गए है दैर-ओ-हरम
यादों को तेरी समझते है हम, जैसे इबादत हो गयी है


Manish Tiwari
वो रो पड़ा फफक फफक के मेरे जाने के बाद
जिसके आँखों में कभी कतरा-ए-अश्क न था



Manish Tiwari