Monday, January 4, 2010

बहुत रोया हूँ शब् भर मैं किसी के देख के आंसू
यही जीवन अगर है तो मरना ही मैं बस चाहूँ

किसी की आँख रोती है किसी का दिल तड़पता है
सभी का जिस्त छलनी है दुआ मांगू तो क्या मांगू

रजामंदी बिना उसके एक पत्ता हिल नही सकता
जिसे ना फ़िक्र बन्दों की उसे कैसे खुदा मानू

नज़र में तीरगी बिखरी नही कोई रौशनी एक भी
उजाले की जरुरत है क्या मैं खुद को जला डालूं

ना जाने शाम से ही क्यों मेरे दिल में है बेचैनी
ये इक घर है उम्मीदों का मैं कोई रंज क्यूँ पालूं


Manish Tiwari

Sunday, November 22, 2009

मुझे इस बात की बेहद ख़ुशी हुई
मुश्किलें मेरे चौखट पे आ के दुखी हुई

चलो माना कि जिस्म मेरा मोम था
रूह की तासीर तो पर पत्थर की हुई

उजड़ गए हैं सभी पेड़ इस आंधी में
बची रही वही गरदन जो थी झुकी हुई

जलाये कौन घर अपना रौशनी के लिए
सुई इसी बात पर आके थी रुकी हुई

वो मुन्तजिर है मेरे बिखर जाने को
उसकी आँखों में है तस्वीर मेरी चुभी हुई

बढाए तू जो कदम साथ मेरे कदमों के
ख़त्म हो जाये सफ़र एक उम्र से रुकी हुई


manish tiwari
वो फूल है शबनम है या फिर महताब सा है
उसके आँखों में एहसास कुछ शराब सा है

कभी हुस्न हो वो हाजिर तो मैं पढ़ भी लूँ
जिसका चेहरा मोहब्बत की किताब सा है

वो सामने से गुजरे और मुझे होश भी नहीं
ये हकीकत भी क्यूँ लगे कोई ख्वाब सा है

आज देखा जो उनका वो बेनकाब हुस्न
ये नज़ारा किसी प्यासे को सैलाब सा है

वो ग़ज़ल है नज़्म या फिर रुबाई है कोई
रंग-ए बू उस ख़याल का जैसे गुलाब सा है


manish tiwari
जिंदगी में रंज-ओ ग़म का सख्त पहरा है
दिखता तो नहीं मगर ज़ख्म बड़ा गहरा है

न उतार तू कश्ती मेरे दिल के समंदर में
ये पानी बड़ी मुद्दत के बाद जा के ठहरा है

सुनाऊं भी तो किसे दास्ताँ दिल की अपनी
हर एक शख्स इस शहर का यहाँ बहरा है

बुझा सकेगा ना कोई प्यास दिल की फिर से
तेरे जाने से दिल का दरिया अब सहरा है

समझेंगे क्या वो किसी दिल की बर्बादी को
आग देख जो कहते है क्या रंग सुनहरा है

जिसे देख मिलती है दिल को तसल्ली मेरे
उस दिल-ए-नादाँ का लाखों में एक चेहरा है



manish tiwari

Friday, August 7, 2009

बंद आँखों से तेरा अक्स अब दिखता नहीं
वफ़ा का रंग अब मेरे लहू में टिकता नहीं

वफ़ा की बात न कर दोस्त इस दुनिया में
ये शै है वो जो बाज़ार में अब बिकता नहीं

तुझे जो मेरे ग़मो से गर इत्तेफाक न रहा
मैं भी तेरे लिए ग़ज़ल कोई लिखता नहीं

सुन चलन प्यार का दुनिया में कुछ ऐसा है
वफादारी दुनिया में कोई अब सीखता नहीं

बात जो दिल में थी अब वो जुबां पे लायी है
आग ऐसी मैं दिल में छुपा के रखता नहीं

जिए तो कैसे और किसके लिए जमाने में
शाम को राह मेरा शिद्दत से कोई तकता नहीं

manish tiwari

Monday, July 27, 2009

मिले हैं ग़म कितने ही मुझे जमाने में
भरा है दर्द ही दर्द बेहद मेरे फ़साने में

है जिद कि मेरी सितम तेरे आजमाने की
मजा तुझे जो आता है गर मुझे सताने में

आ कभी बैठ तो फुरसत से मेरे पास में तू
वक्त लगना है जरा ज़ख्म तुझे दिखाने में

है कबूल मुझको दुनिया के इल्जाम सभी
अभी भी बाकी है बहुत जान तेरे दीवाने में

क्यूँ खफा हो के तुम इस तरह सताते हो
तेरा भी कोई दिन गुजरे मुझे मनाने में


Manish Tiwari
वो अपने हुस्न को कैद-ए-नकाब रखते है
साँस में खुशबू तो आँखों में शराब रखते है

कि अदायें उनकी किसी कातिल से कम नही
जुल्फ में बिजली जो होंठो पे गुलाब रखते है

एक औराक-ए-उल्फत भी नही नसीब हमको
सुनते है कि वो पास अपने पूरी किताब रखते है

शाम रंगीन सा हो और पास हो वो माह्पारा
तेरे दीवाने भी कुछ ऐसे हसीं ख्वाब रखते हैं

छू ले गर भूल से तुझको तो पिघल जाये ही
तन में अपने वो क़यामत सा शबाब रखते है

हमने देखा है उसके हुस्न-औ-जमील का असर
अब तो वाइज भी अपनी नीयत ख़राब रखते है

Manish Tiwari